हममे तुझमे जो अंतर है,
वह बीच में रेखा खीचता है.
हममे तुझमे जो गहनता है,
जग उसे क्यों नहीं देखता है?
हम तुम देखो जुड़े हैं- कैसे?
नदी के तीर आपस में जैसे.
चलते-चलते थक जायेंगे
बहते - बहते मिट जायेंगे.
शंख- सीप-मोती लुटाकर भी
मिलने को तरस हम जायेंगे.
मिल सकते हैं दोनों तब जब
दरिया - हिमनद सुख जायेंगे.
लेकिन कब हम चाहेंगे ऐसा?
क्या चाह हमारी स्वार्थ जैसा?
हम ऐसे ही बहते जायेंगे,
मिट्टी को बना के उपजाऊ.
प्यार की फसल खिलाएंगे
नहीं सूखने देंगे हिमनद को,
हम अश्रु यूं ही पी जायेंगे
ऐसे ही ...चलते जायेंगे.....
ऐसे ही ...बहते जायेंगे.....
अभी हवा का झोंका आया
साथ मधुर संगीत भी लाया,
"तन से तन का मिलन हो
जरूरी नहीं, मन से मन का
मिलन कोई कम तो नहीं".
हम इसे आदर्श बनायेंग,
मन को भी समझायेंगे.
अब अश्रु नहीं बहायेंगे,
अपना फर्ज निभायेंगे...
,
Tuesday, November 9, 2010
Wednesday, November 3, 2010
तन दीपक मेरा मन दीपक

तन दीपक मेरा मन है दीपक, दीपक मेरा सपना है;
जग को कहीं करे आलोकित उससे रिश्ता अपना है.
घर को करे प्रकाशित दीपक, कुल का मान बढाता दीपक,
उषा का साथ निभाता दीपक, निशा को दूर भगाता दीपक .
आता है नित संध्या के संग, क्या-क्या रूप दिखाता दीपक,
घर में किरण को लाये दीपक, ज्योत्सना गले लगाये दीपक.
उज्ज्वलता को बाहर बाहर , काजल को ह्रदय समाये दीपक,
कोमल कांति, तेल शान्ति संग, दीपशिखा को भाता दीपक.
गौर वर्ण का प्यारा दीपक, कजरी मन को भाये दीपक,
बैठी काजल कंचन के ऊपर, स्नेह डोर से बंधा है दीपक.
चौकठ पर पहरेदार है दीपक, प्रवेश द्वार लहराए दीपक,
आंधी और तूफ़ान में देखो, साहस खूब दिखाए दीपक.
मिटटी का दीपक,पीतल का दीपक रोब जमाये चांदी दीपक,
सारे दीपक पड़ जाये फीके, जब कनकलता संग आये दीपक.
काया कांति हो जाए सो गुनी, जब अंतर लाओ जलाए दीपक,
काया की भी रहे न छाया , जब शव को आग लगाये दीपक.
देखो ध्यान से यदि दीपक को आशा की सदा जलाए दीपक.
कबीर के घर तेज है दीपक, वे लिए लुकाठी हाथ है दीपक.
तुलसी के घर भक्ति है दीपक, सूर का है वात्सल्य यह दीपक.
मीरा के पाव घुघरू है दीपक, नाची बन गिरिघर संग दीपक.
देखो जिसका घर उजियारा, गीता वहां कुरान है दीपक.
तुम भी बन जाओ मेरे भैया! , मेरे विश्व वसुधा का दीपक,
रखो, संभालो अपना दीपक, कर्त्तव्य का दूसरा नाम है दीपक.
हुई भंग यदि विधि व्यवस्था, घर को भी आग लगाता दीपक.
नहीं चाहिए मुझे निर्वाण, यदि अर्थ है इसका - 'बुझ जाना'.
मुझको मेरा दीपक है प्यारा, प्यारा उसका जलते रहना.
तन दीपक, मेरा मन है दीपक, दीपक मेरा सपना है,
जग को कहीं भी करे आलोकित, उससे रिश्ता अपना है.
Saturday, October 30, 2010
ब्रह्माण्ड की प्रथम दीपावली
"....तम आसीत् ...तमासा गूढं अग्रे...न सत आसीत् .. न असत आसीत्...रजः न आसीत ...न व्योमा ...न मृत्यु आसीत ...न अमृत आसीत ...." .
नासदीय सूक्त के इन खण्ड पंक्तियों का भाव यह है कि...तब सृष्टि के पूर्व, था केवल सघन ..घनीभूत ..अँधेरा...तम ..ही ..तम ..नीरवता - नि:शब्दता का ही साम्राज्य था वहाँ. .....तब शान्ति भी ....डरावनी शान्ति सी ..लग रही थी, उस घोर गहन अन्धकार में ...... जहां नाम - रूप - संज्ञा - सर्वनाम - विशेषण - विशेष्य ...सभी का एकदम अभाव. क्रियाशीलता भी कार्य से विरत होकर निष्क्रियता की मोटी चादर ओढ़े प्रगाढ़ निद्रा में कहीं पड़ी सो रही थी. श्वांस -प्रश्वांस भी तो नहीं था वहाँ . सत्य-असत्य , जन्म-मृत्यु से परे ...एकदम स्तब्ध कर देने वाली सन्नाटा -... कुहासा - कालिमा - अन्धेरा ही फैला हुआ था दूर-दूर तक....इसे 'शून्यता' तो नहीं कह सकते, हाँ इसका गणितीय मान 'शून्य' ही था ...क्योकि समस्त 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' स्थितिज ऊर्जा में संचित और संरक्षित थी. नासदीय सूक्त का (2 श्लोक ) द्रष्टव्य -
नासदासीन्नोसदासीत्तादानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत |
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गहनं गभीरं || १ ||
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्याऽआह्नऽआसीत्प्रकेतः |
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्नपर: किन्चनास || २
वहाँ केवल और केवल एक 'अकेला चैतन्य' जिसे "तदेकं" कहा गया है, स्वयं में ही समाधिस्थ था. - "तत एकं अवातं स्वधया आसीत". उससे परे कुछ भी न था - ''तस्मात् - अन्यत - किंचन परः न आस' . पवन - पानी - ऊष्मा ...कुछ भी तो नहीं था. चैतन्य की शान्ति भंग हुई..उसने तप किया, चिंतन किया - यह प्रथम क्रिया थी. उसने संकल्प किया और कार्य प्रारंभ हो गए; यह दूसरी क्रिया थी, ...'कामः तत्र अग्रे समवर्तत'. अन्धेरा छटा, प्रकाश पुंज फैली, प्रकाश और ऊष्मा की परस्पर अभि क्रिया से 'सलिलं' / 'आर्णव' (जल) की उत्पत्ति हुई. उस जल में चैतन्य ने अपनी कामना का बीजारोपण किया. कामना जल में 'अंडा' रूप में 'तैरती दृष्टिगत हुयी. उसी प्रथम सृजन को को 'ब्रहमांड-बीज', गर्भ, 'Universe Egg' ..इत्यादि नामों से विभिन्न ग्रंथों में वर्णित किया गया है. वह अंडा सुदीर्घ काल तक जल में पड़ा रहा. पुनः तदेकं की समाधि से जाग्रति हुयी. कामना रंग लाई, अब अंडा सुवर्णमय, स्वर्णिम हो गया हो गया, हिरण्मय हो गया, उसकी कान्ति हिरण्यं सी रमणीय हो गयी. अब इसे कहा गया 'हिरण्यगर्भ' या 'Golden Egg' ..उस हिरण्यगर्भ' के 'स्फोट' से उसमे अंतर्भूत सभी प्रकार के संचित तत्त्वों / पदार्थों का दूर - दूर तक दसों दिशाओं में प्रक्षेपण हो गया. यह था ब्रह्माण्ड का प्रथम - 'पटाखा'....भरपूर ...जोरदार धमाका... धमाके से बिखरे छोटे -बड़े पिंडों ने - पिंड - गृह - नक्षत्र - तारे और निहारिकाओं का रूप धारण किया, पञ्च महाभूत अस्तित्व में आये और 'पुरुष" सिद्धांत से' विराट प्राकट्य हुआ, जिसकी प्रथम पहचान 'प्रजापति सिद्धांत' के रूप में हुयी, बाद में आगे चलकर थोड़े - बहुत परिवर्तन - परिवर्द्धन के बाद इसे ही 'ब्रह्मा सिद्धांत' और 'विश्वकर्मा सिद्धांत' भी कहा गया. विज्ञान / अंतरिक्ष विज्ञान कहता है इस सृष्टि का कारण महाविस्फोट 'Bigbang' है., अध्यात्म कहता है - 'स्फोट' है. बातें वहीँ हैं, जोर का धमाका. विज्ञान का धमाका आहट ध्वनि (घर्षण प्रादुर्भूत) है, जबकि अध्यात्म का धमाका 'अनाहत ध्वनि' है.यही 'ओमकार' है. घनीभूत अंडे का फूटना , प्रकाश और स्वर्णिम पदार्थों का, चकाचौध कर देने वाला प्रकीर्णन, प्रक्षेपण - प्रकाशोत्सव. यही है - 'ब्रह्माण्ड की प्रथम दीपावली'. अभियान था - अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा - तमसो माँ ज्योतिर्गमय. इसे सार्थक बनाया , असत से सत की ओर उन्मुख होने की ललक ने - 'असतो माँ सदगमय', और जिसका अंतिम उद्देश्य था - मृत्यु को नकार कर अमृतत्त्व की प्राप्ति - 'मृत्युर्मा अमृतंगमय. इस सन्देश को, इस उद्देश्य को फैलाने का कार्य दीपक को है. हां चौकठ का दीपक, कलश का दीपक, यज्ञ का दीपक ...यही दीपक, जलता दीपक - ज्ञानरुपी पुरोहित है -'अग्निमीले पुरोहितं'. दीपक लघु रूप है और सूर्य - तारे विराट रूप है दीपक का. सूर्य पूजन का "छठ पर्व' यदि इसी परिप्रेक्ष्य हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
इस ज्ञान प्रकाश का प्रभाव क्या हुआ? पहले जो अँधेरी कालिमा थी, चारो दिशाओं, दसों दिशाओं में व्याप्त होने के कारण चतुर्भुजी - अष्टभुजी - दसभुजी क़ाली - कराली - कपालिनी और डरावनी थी, वही अब दिव्य ज्ञान के आलोक में 'गोरी' हो गयी है, 'गौरी' हो गयी है. गिरिजा - शैलजा - शैलपुत्री बन गयी है. क्षीरसागर निवासिनी कमला - कल्याणी हो गयी है....लक्ष्मी - महालक्ष्मी - वैभव लक्ष्मी हो गयी है. लक्ष्मी तो सागर पुत्री है, सलिल तनया है, उसी की आराधना - वंदना पूजा का त्योहार है - 'प्रकाशपर्व, ज्योतिपर्व दीपावली'. लक्ष्मी को पाना है तो सागर में गोता लगाना होगा. इसके लिए सत्साहस, बुद्धि - विवेक और श्रम की अनिवार्यता. लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन इसी का प्रतीक है. गणेश यानी बड़ा कान, सुनो सबकी, सभी मान्यताओं / सिद्धांतों / तर्क - कुतर्क सुने; लेकिन लक्ष्य में सूक्ष्मता हो, केवल लक्ष्य को देखो! उसी का संधान करो!! 'लक्ष्मी जी' आलसी - अविवेकी को लभ्य नहीं है. लेकिन हम तथ्यों को न समझकर दीप मालाओं की लडियां, झिलमिलाते झालरों, बल्बों के डिजाइनदार जालों से, आकर्षक रूप में घरों को, भवनों को सजा लेना ही इसकी योग्यता मान बैठे है.
क्या कभी आपने सोचा है - कहीं वहाँ कोई कालिमा, कोई धब्बा, कोई ईर्ष्या-द्वेष तो नहीं है मन के आँगन में? यदि है तो मिटा डालिए इसी ज्ञानदीप से उस कालिमा को, धो डालिए उस धब्बे को.क्योकि मानव मन के इसी अन्धकार को, बुराइयों को विजित कर 'प्रकाश' और 'ज्ञान' फैलाने का पावन पर्व है - 'दीपावली'. यह प्रत्येक मन में उठने वाले स्नेहिल उत्साह और उमंग प्रदर्शन का भी प्रतीक है - 'दीपावली'. परन्तु अफ़सोस! बहुत ही अफ़सोस !! न जाने कब और कैसे जुआ और चौपा खेलने जैसी कुरीति और बुराई ने दीपावली से नाता जोड़ लिया. यह बद्तोब्याघात है और दीपावली का घोर अपमान भी. इस कुरीति को मिटाना ही दीपावली की श्रेष्ठ पूजा है. दीपावली तो मन का उल्लास है, जब भी मानव का मन खुश होता है, वह प्रसन्न होता है - जोर से ठहाके लगाता है, जोरदार पटाखे बजता है, घर को खुशियों से रोशन करता है. बुराई पर अच्छाई की जीत मानव की सामूहिक जीत है. रावण पर राम की विजय सभी के मन को इसीलिए भाती है. .नगर वासियों ने राम के स्वागत में नगर को सजाया, पटाखे छोड़े, मंगल गीत गाये, सत्य का, अच्छाई का समर्थन किया. अब अच्छाई की यह जीत एक रूढी बन गयी है.यहाँ बताते चलें; मानव मन बुरा नहीं है, बुरा होता तो दीपावली नहीं मनाता. परन्तु विडम्बना यह है कि दीपावली मनाने का ढंग आज भव्यता और धन-प्रदर्शन की अभिरुचि ने ले रखा है. इस भोंडा प्रदर्शन ने दीपावली की महिमा बधाने की बजाय घटाई है. अंतर के उमंग को, अंतर की ज्योति को, अंतरात्मा के घर को यदि ज्योति से जगमगा दिया जाय तो यही दीपावली सर्वश्रेष्ठ दीपावली है. बारूद के पटाखे छोड़ना, पर्यावरण को दूषित करना, बुद्धिमानी नहीं. इस विन्दु पर बुद्धिजीवी वर्ग को ही बार-बार चिंतन करने की आवश्यकता है.
आज भी हम उसी परम्परा को निभा रहे है. और सच कहा जाय तो अब इस परम्परा को ढो रहें है. कहाँ गया हमारा पवित्र उद्देश्य? कहाँ गए हमारे अंतर के छलकते - उमड़ते - घुमड़ते प्यार? परमात्मा ने, 'तदेकं' ने जब दीपावली मनायी - ब्रह्माण्ड का सृजन किया. हमने दीपावली में क्या सृजित किया? इस प्रश्न पर अवश्य ही विचार करना चाहिए. निद्रा देवी की गोद में जाने से पूर्व यदि हम-आप द्वारा अपने दैनिक कृत्य का स्व मूल्यांकन कर लिया जाय, अपने तन-मन को ही दीपक बना लिया जाय तो यही होगी सबसे बड़ी - 'दीपावली'. यही होगी इस पर्व की सबसे बड़ी उपयोगिता और उपादेयता. मैंने तो बना लिया दीपक, अपने तन को, अपने मन को. क्या आप तैयार है साथ निभाने के लिए? अरे ! यह दीपक अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह माता-पिता के सामान पालक - पोषक - कल्याणकारी है -"स न: पितवे हूँ वेगने सूपायनो भव". इसलिए मै तो यही कहूँगा और कहता रहूंगा ----
तन दीपक मेरा मन दीपक / दीपक मेरा सपना है / जग को कहीं करे आलोकित / उससे रिश्ता अपना है / दम्भ बताना दीपक को / दीपक का अपमान है / यह आपबी नादानी और / विवेक हीनता की पहचान है / दीपक तो प्रतीक है / सामजिक एकता और प्रकृति के साथ / अद्भुत सौहार्द्र और सद्भाव का / सामंजस्य का .. / खेत की मिट्टी / तालाब का जल / रजनीश की शीत / दिनकर का प्रकाश / पवन की श्वांस / आकाश का अवकाश / बॉस का डंडा / गो-वंश का कंडा / कुम्भकार का श्रम / अग्नि की दाहकता / चित्रकार की कल्पना / फूलों का रंग / घूमते चाक का नृत्य / तेली का तेल / किसान का घृत / कपास की पौध / पौध की रूई / जिसे बनाकर बत्ती / दादी माँ ने अपनी श्रद्धा / है उसमे पिरोई / तब ई है दीपक में जान / देखो कैसे देखा रहा है शान / मिटा देगा अब अँधेरे का नामों ईशान / हमको भी दीपक बन जाना है / इसका आदर्श निभाना है / बदल सकता है दीपक का रंग -रूप / आकार - प्रकार / पर नहीं बदल सकता / दीपक का विशिष्ट व्यवहार / क्योकि वह व्यवहार ही / दीपक का प्राण है / इसके अभाव में वह निर्जीव - निष्प्राण है / ज्योतिहीन दीपक निररथक / और निष्प्राण ही नहीं / कलंक है - कुल का, समाज का, राष्ट्र का..
Tuesday, October 26, 2010
कुछ पूछना है मुझे
स्वर्ण और आभूषण में
सागर और लहरों में,
सूर्य और किरणों में
रजनीश और रश्मियों में.
आखिर क्या है - भेद?
और क्या है - अभेद?
आभूषण जो बनता है
स्वर्ण से ही किन्तु
स्वर्णकार और कलाकार
की हथौड़ी खाने के बाद.
लहरें जो उठती है सागर में
ही लेकिन पवन के झकोरों
ज्वार -भाता की हलचल
और उमंगों तरंगों के बाद.
किरने भी आती है धरती पर
सूर्य की चिता जलने के बाद.
रश्मियाँ भी धरा पर आती हैं
हने बार- बार ललचाती है
परन्तु सूर्य किरणों के चन्द्र
सतह से टकराने के बाद.
इनमे पूर्ववर्ती यदि अक्षर है
तो परवर्ती है - शब्द व्यापार.
जो तैयार करता है किसी
साहित्य किसी काव्य का आधार
इसी साहित्य में इसी काव्य में
अपने अस्तित्वपूर्ण अर्थ का विस्तार
पाता है - वह स्वर्ण, वह सागर..,
वह दिनकर वह रजनीश ....
बनकर किसी वागीश का शिष्य.
सागर और लहरों में,
सूर्य और किरणों में
रजनीश और रश्मियों में.
आखिर क्या है - भेद?
और क्या है - अभेद?
आभूषण जो बनता है
स्वर्ण से ही किन्तु
स्वर्णकार और कलाकार
की हथौड़ी खाने के बाद.
लहरें जो उठती है सागर में
ही लेकिन पवन के झकोरों
ज्वार -भाता की हलचल
और उमंगों तरंगों के बाद.
किरने भी आती है धरती पर
सूर्य की चिता जलने के बाद.
रश्मियाँ भी धरा पर आती हैं
हने बार- बार ललचाती है
परन्तु सूर्य किरणों के चन्द्र
सतह से टकराने के बाद.
इनमे पूर्ववर्ती यदि अक्षर है
तो परवर्ती है - शब्द व्यापार.
जो तैयार करता है किसी
साहित्य किसी काव्य का आधार
इसी साहित्य में इसी काव्य में
अपने अस्तित्वपूर्ण अर्थ का विस्तार
पाता है - वह स्वर्ण, वह सागर..,
वह दिनकर वह रजनीश ....
बनकर किसी वागीश का शिष्य.
Thursday, October 21, 2010
संवाद: गंगा और यमुना का
गंगा - यमुना दो बहने हैं
उदगम दोनों का हिमालय है,
गंगा की जन्मस्थली -'गोमुख'
यमुना की वहीं -'यमुनोत्री' है.
दोनों ही बहती प्यार लिए
स्नेहिल वेगमय धार लिए,
दोनों का पथ है अलग -अलग
संगम पर एकदिन जा के मिले.
थी मिलने की खुशियाँ भी बहुत
पर रंजोगम कुछ कम भी न था,
जब कुशल क्षेम की बात चली
मन का भांडा फिर फूट पड़ा.
बोली यमुना यूँ गंगा से -
मुझमे तुझमे यह भेद है क्यों?
सांवली हूँ मै तू गोरी है...,
इस रंग पर इतनी गर्विता क्यों?
माना तू प्रिय है -भोले को ,
उच्श्रृंखला हो मस्तक जा बैठी
कुछ शर्म करो उस भगिनी का,
क्यों हक उसका तुम छिन बैठी?
हक मेरा छिनना चाहती हो
क्यों इतना मुझे सताती हो?
क्या रंग - रूप ही है सब कुछ,
इतना जो तुम इतराती हो.
यह मानव जाती पूजती तुमको,
मै पड़ी - पड़ी ललचाती हूँ.
क्या तुझमे अधिक है मुझसे?
आज तुमसे ही सुनना चाहती हूँ.
बोली गंगा - सुनो बहना मेरी!
है भ्रम तेरा यह ईर्ष्या है तेरी.
थी बसती मै 'हरि चरणों में',
अनुरक्ति मेरी 'हरि चरणों में'.
उन चरणों का ही प्रसाद मिला,
मुझे तारने का अधिकार मिला.
जिसको हो समझती उच्श्रृंखलता
वह गर्व नहीं है - समर्पण है'..
समर्पित का स्थान है - 'दो ही',
एक दिल है और एक मस्तक है.
दिल में रहती मेरी भगिनी है,
मुझे मिला स्थान जो, 'मस्तक' है.
था अधिकार यह भोले को,
चाहे जैसा व्यवहार करें.
मै तो हूँ - 'शिष्या' उनकी,
मत करो संदेह पवित्रता पर.
निज मन की यह विकृति तेरी,
कुछ शर्म करो! कुछ शर्म करो! !
पूछा तुमने जब अंतर है,
उसको अब तुम्हे बताती हूँ,
जिस 'हर' की हूँ दासी मै.
तू उसकी गेंद चुराती है.
शरण स्थली बनी रही हो,
ताज दिया तूने मर्यादा है.
पहले था संरक्षण कालिया को,
अब संरक्षण विधि छलिया को.
सीख मान लो बहना मेरी!
संकल्प सहित यह यह कहती हूँ.
है साक्षी इसकी सरस्वती यहाँ,
चलो सभे संग अब बहती हूँ.
मुझमे तुझमे कुछ भेद नहीं,
जो गंगा है वह यमुना है.
मिटा राग - ईर्ष्या जब से
नाम -रूप रंजोगम खो गाया,
मन का सब मालिनी धुल गया.
अब तो सब गंगा ही गंगा.
मिला संयुक्त अधिकार जब तारने का
निज नाम भूल गयी यमुना अब,
लगी कहने निज को भी गंगा-गंगा अब.
सभी के मन में बसती हैं ये,
गंगा - यमुना जो नदियाँ हैं.
अब तेरे ऊपर है मेरे भाई!
कौन बहती तेरी 'अखियाँ हैं'.
उदगम दोनों का हिमालय है,
गंगा की जन्मस्थली -'गोमुख'
यमुना की वहीं -'यमुनोत्री' है.
दोनों ही बहती प्यार लिए
स्नेहिल वेगमय धार लिए,
दोनों का पथ है अलग -अलग
संगम पर एकदिन जा के मिले.
थी मिलने की खुशियाँ भी बहुत
पर रंजोगम कुछ कम भी न था,
जब कुशल क्षेम की बात चली
मन का भांडा फिर फूट पड़ा.
बोली यमुना यूँ गंगा से -
मुझमे तुझमे यह भेद है क्यों?
सांवली हूँ मै तू गोरी है...,
इस रंग पर इतनी गर्विता क्यों?
माना तू प्रिय है -भोले को ,
उच्श्रृंखला हो मस्तक जा बैठी
कुछ शर्म करो उस भगिनी का,
क्यों हक उसका तुम छिन बैठी?
हक मेरा छिनना चाहती हो
क्यों इतना मुझे सताती हो?
क्या रंग - रूप ही है सब कुछ,
इतना जो तुम इतराती हो.
यह मानव जाती पूजती तुमको,
मै पड़ी - पड़ी ललचाती हूँ.
क्या तुझमे अधिक है मुझसे?
आज तुमसे ही सुनना चाहती हूँ.
बोली गंगा - सुनो बहना मेरी!
है भ्रम तेरा यह ईर्ष्या है तेरी.
थी बसती मै 'हरि चरणों में',
अनुरक्ति मेरी 'हरि चरणों में'.
उन चरणों का ही प्रसाद मिला,
मुझे तारने का अधिकार मिला.
जिसको हो समझती उच्श्रृंखलता
वह गर्व नहीं है - समर्पण है'..
समर्पित का स्थान है - 'दो ही',
एक दिल है और एक मस्तक है.
दिल में रहती मेरी भगिनी है,
मुझे मिला स्थान जो, 'मस्तक' है.
था अधिकार यह भोले को,
चाहे जैसा व्यवहार करें.
मै तो हूँ - 'शिष्या' उनकी,
मत करो संदेह पवित्रता पर.
निज मन की यह विकृति तेरी,
कुछ शर्म करो! कुछ शर्म करो! !
पूछा तुमने जब अंतर है,
उसको अब तुम्हे बताती हूँ,
जिस 'हर' की हूँ दासी मै.
तू उसकी गेंद चुराती है.
शरण स्थली बनी रही हो,
ताज दिया तूने मर्यादा है.
पहले था संरक्षण कालिया को,
अब संरक्षण विधि छलिया को.
सीख मान लो बहना मेरी!
संकल्प सहित यह यह कहती हूँ.
है साक्षी इसकी सरस्वती यहाँ,
चलो सभे संग अब बहती हूँ.
मुझमे तुझमे कुछ भेद नहीं,
जो गंगा है वह यमुना है.
मिटा राग - ईर्ष्या जब से
नाम -रूप रंजोगम खो गाया,
मन का सब मालिनी धुल गया.
अब तो सब गंगा ही गंगा.
मिला संयुक्त अधिकार जब तारने का
निज नाम भूल गयी यमुना अब,
लगी कहने निज को भी गंगा-गंगा अब.
सभी के मन में बसती हैं ये,
गंगा - यमुना जो नदियाँ हैं.
अब तेरे ऊपर है मेरे भाई!
कौन बहती तेरी 'अखियाँ हैं'.
Wednesday, October 20, 2010
अनुभूति के सप्त सोपान
मित्रों!
इ-मेल पर 'लौटा हू अन्तरिक्ष से आज' पर कई प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुयी है. कुछ ने संकेत से तो कुछ्ने सीधे ही कहा है - 'अरे भाई गए भी थे या हांक रहे हो'. गए थे तो स्टेसनो के नाम, रंग -रूप अनुभूति बताओ. प्रश्न उपेक्षणीय नहीं था, यद्यपि मै जानता हूँ यह स्नेह ही है, व्यंग्यात्मक पुट लिए तथापि ये प्रतिक्रियाएं गल्प हों या हास्य हो, उपहास हो, हास्य हो या कटाक्ष हो, ..एक प्रश्न तो है ही .. और जब प्रश्न है तो उत्तर भी आना ही चाहिए...इसलिए देर से ही सही जो स्थिति थी उसे बांटना चाहता हूँ आप सभी के साथ...और उनका बहुत बहुत आभार जिनके प्रश्न और जिज्ञासा ने यह सृजन कराया....
अनुभूति के सप्त सोपान
हाँ यह सच है भाई !
गया था वहाँ लेकर तीर - कमान
तर्क - वितर्क - निरा अभिमान.
मै हूँ स्वयं और मेरे संग
कठोपनिषद सा है - 'नचिकेता'.
लेकिन जाने कहाँ खो गया?
'मन का मान' प्रिय वह प्रचेता.
जाने कहा खो गयी - 'वह भी',
था जिस पर मुझको बहुत गुमान
गार्गी, भारती, सावित्री, सत्यवान.
'मैं' छूटा, 'मै-पन' भी छूटा
छूटा सब अपनापन भी.
खो गए स्नेह- सत्कार- घृणा,
खोया ये दीपक - आरती भी.
दूजे पर तो नाम भूल गया
रही शेष ..'हूँ' ...की स्मृति.
तीजे पर वह भी गयी
खो गयी सारी ...विकृति...
चौथे पर लिंग भेद खो गया
अहं - इदं का भेद भी गया.
जो अब है केवल 'वह' है.
यह प्रतिरूप उसी 'वह' का है.
पांचवे पर यह 'है' भी गया.
बचा रहा अब केवल - 'वह'.
परन्तु 'वह' कौन वह?
लिंग भेद से परे एक ज्योति.
जहा अहं-इदं-त्वम् का लोप.
केवलं - केवलं - इदं केवलं.
जो है - 'त्वं स्त्री', 'त्वं पूमां'..
ना स्त्री, और ना पूमान.
'अर्द्ध- नारीश्वरम' केवलम
सत्यम केवलं शक्ति केवलं,
शिवं केवलं, ....शुभं केवलं
मिटा छठे पर शिव-शक्ति युग्म
वह अलिंगी अर्द्धनारीश्वरम भी.
अब बचा है केवल- आनन्दम ...
मधुरं - मधुरं - आनन्दम....
सातवे पर यह 'आनंद' भी मिटा
अब केवलं केवलं 'महाशून्यम'
'महाशून्यम' .. .'महाशून्यम'.
अबतक तो था 'अस्ति' को जाना,
जाना अब अंतिम 'नास्ति' भी .
लौटा कैसे? मै नहीं जानता
लौटी तंद्रा, मै तो मंदिर में था.
था माँ के दरबार में.शंख - घंटा -
घडियाल - जयकारा की नाद में, ..
सामने दीपक -धूप जल रहा था
मै तो दुर्गा सप्तसती पढ़ रहा था..
इ-मेल पर 'लौटा हू अन्तरिक्ष से आज' पर कई प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुयी है. कुछ ने संकेत से तो कुछ्ने सीधे ही कहा है - 'अरे भाई गए भी थे या हांक रहे हो'. गए थे तो स्टेसनो के नाम, रंग -रूप अनुभूति बताओ. प्रश्न उपेक्षणीय नहीं था, यद्यपि मै जानता हूँ यह स्नेह ही है, व्यंग्यात्मक पुट लिए तथापि ये प्रतिक्रियाएं गल्प हों या हास्य हो, उपहास हो, हास्य हो या कटाक्ष हो, ..एक प्रश्न तो है ही .. और जब प्रश्न है तो उत्तर भी आना ही चाहिए...इसलिए देर से ही सही जो स्थिति थी उसे बांटना चाहता हूँ आप सभी के साथ...और उनका बहुत बहुत आभार जिनके प्रश्न और जिज्ञासा ने यह सृजन कराया....
अनुभूति के सप्त सोपान
हाँ यह सच है भाई !
गया था वहाँ लेकर तीर - कमान
तर्क - वितर्क - निरा अभिमान.
मै हूँ स्वयं और मेरे संग
कठोपनिषद सा है - 'नचिकेता'.
लेकिन जाने कहाँ खो गया?
'मन का मान' प्रिय वह प्रचेता.
जाने कहा खो गयी - 'वह भी',
था जिस पर मुझको बहुत गुमान
गार्गी, भारती, सावित्री, सत्यवान.
'मैं' छूटा, 'मै-पन' भी छूटा
छूटा सब अपनापन भी.
खो गए स्नेह- सत्कार- घृणा,
खोया ये दीपक - आरती भी.
दूजे पर तो नाम भूल गया
रही शेष ..'हूँ' ...की स्मृति.
तीजे पर वह भी गयी
खो गयी सारी ...विकृति...
चौथे पर लिंग भेद खो गया
अहं - इदं का भेद भी गया.
जो अब है केवल 'वह' है.
यह प्रतिरूप उसी 'वह' का है.
पांचवे पर यह 'है' भी गया.
बचा रहा अब केवल - 'वह'.
परन्तु 'वह' कौन वह?
लिंग भेद से परे एक ज्योति.
जहा अहं-इदं-त्वम् का लोप.
केवलं - केवलं - इदं केवलं.
जो है - 'त्वं स्त्री', 'त्वं पूमां'..
ना स्त्री, और ना पूमान.
'अर्द्ध- नारीश्वरम' केवलम
सत्यम केवलं शक्ति केवलं,
शिवं केवलं, ....शुभं केवलं
मिटा छठे पर शिव-शक्ति युग्म
वह अलिंगी अर्द्धनारीश्वरम भी.
अब बचा है केवल- आनन्दम ...
मधुरं - मधुरं - आनन्दम....
सातवे पर यह 'आनंद' भी मिटा
अब केवलं केवलं 'महाशून्यम'
'महाशून्यम' .. .'महाशून्यम'.
अबतक तो था 'अस्ति' को जाना,
जाना अब अंतिम 'नास्ति' भी .
लौटा कैसे? मै नहीं जानता
लौटी तंद्रा, मै तो मंदिर में था.
था माँ के दरबार में.शंख - घंटा -
घडियाल - जयकारा की नाद में, ..
सामने दीपक -धूप जल रहा था
मै तो दुर्गा सप्तसती पढ़ रहा था..
Friday, October 15, 2010
लौटा हूँ आज अन्तरिक्ष से
अपनी सुदूर .......यात्रा से
वापस लौट आया हूँ आज..
अब कल्यारार्थ खोलता हूँ -
उस अनूभूति, शास्त्रार्थ का -
कुछ गूढ़ - रहस्य, कुछ राज.
गया था सगर्व - साभिमान
करने शास्त्रार्थ, मांगने बरदान
परन्तु ..वहाँ भूल गया सबकुछ,
खो गयी बुद्धि - विवेक - चातुर्य.
रह गया मौन, बस मौन...निर्वात ..
खो गयी सब मन की स्रिष्टि....,
कर न सका कुछ प्रश्न,,,,,
वाणी हो गयी एकदम मौन.
सारे भेद खो गए वहीँ पर
बचा ही नहीं कोई - प्रश्न.
सब कुछ वहाँ तो है - अभेद.
बची केवल और केवल अंतर्दृष्टि
.'पुरुष' वह है - 'परम चैतन्य'
वह तो है - 'एक अनन्य'.
जिसका न आदि है न अन्त.
वही है पतझड़, वही बसंत.
वही है 'शून्य', वही -'अनंत'.
ज्ञान का वह - परमधाम
चेतना का वह परम आगार,
किन्तु यह 'पुरुष' भी है -
'प्रकृति' भी, अलिंगी है,
अभेद, अर्द्ध- नारीश्वर..
गूंगा ज्ञान है भक्ति बिना और
परिचय नहीं उसका कर्म बिना.
देखा नहीं है - भेद वहाँ कोई,
उच्चतम शिखर, निम्नतम खाई में.
अनंत और शून्य में, जड़ - चेतन में.
कर्म - ज्ञान - भक्ति और योग में...
नहीं है कोई भेद वहाँ योगी की
समाधि और भक्त की अनुरक्ति में.
कलमा और मन्त्र की शक्ति में...,
गीता - पुराण और कुरआन ...में.
मुक्ति - मोक्ष - कैवल्य - निर्वाण में,
बका और फ़ना की अंतिम स्थिति में.
ज्ञान - कर्म - योग और भक्ति का
समुच्चय ही है - 'वह दिव्य विन्दु' .
जो है - अंततः सभी का एक मात्र
गंतव्य, मंतव्य और अंतिम प्राप्तव्य.
.
वापस लौट आया हूँ आज..
अब कल्यारार्थ खोलता हूँ -
उस अनूभूति, शास्त्रार्थ का -
कुछ गूढ़ - रहस्य, कुछ राज.
गया था सगर्व - साभिमान
करने शास्त्रार्थ, मांगने बरदान
परन्तु ..वहाँ भूल गया सबकुछ,
खो गयी बुद्धि - विवेक - चातुर्य.
रह गया मौन, बस मौन...निर्वात ..
खो गयी सब मन की स्रिष्टि....,
कर न सका कुछ प्रश्न,,,,,
वाणी हो गयी एकदम मौन.
सारे भेद खो गए वहीँ पर
बचा ही नहीं कोई - प्रश्न.
सब कुछ वहाँ तो है - अभेद.
बची केवल और केवल अंतर्दृष्टि
.'पुरुष' वह है - 'परम चैतन्य'
वह तो है - 'एक अनन्य'.
जिसका न आदि है न अन्त.
वही है पतझड़, वही बसंत.
वही है 'शून्य', वही -'अनंत'.
ज्ञान का वह - परमधाम
चेतना का वह परम आगार,
किन्तु यह 'पुरुष' भी है -
'प्रकृति' भी, अलिंगी है,
अभेद, अर्द्ध- नारीश्वर..
गूंगा ज्ञान है भक्ति बिना और
परिचय नहीं उसका कर्म बिना.
देखा नहीं है - भेद वहाँ कोई,
उच्चतम शिखर, निम्नतम खाई में.
अनंत और शून्य में, जड़ - चेतन में.
कर्म - ज्ञान - भक्ति और योग में...
नहीं है कोई भेद वहाँ योगी की
समाधि और भक्त की अनुरक्ति में.
कलमा और मन्त्र की शक्ति में...,
गीता - पुराण और कुरआन ...में.
मुक्ति - मोक्ष - कैवल्य - निर्वाण में,
बका और फ़ना की अंतिम स्थिति में.
ज्ञान - कर्म - योग और भक्ति का
समुच्चय ही है - 'वह दिव्य विन्दु' .
जो है - अंततः सभी का एक मात्र
गंतव्य, मंतव्य और अंतिम प्राप्तव्य.
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