यूँ तो माँ को गुज़रे हुए
हो गए हैं, कई वर्ष .
किन्तु लगता है......,
वह है बहुत निकट.....,
यहीं कहीं, आस पास ही.
मनाता हूँ अब भी श्रद्धा से -
'श्राद्ध', उसकी पुण्य तिथि को
प्रत्येक वर्ष, वैसे ही जैसे
कभी वह मनाती थी -
मेरा जन्मदिन हरसाल- हरवर्ष.
हाथ जोड़कर, विनीत भाव में
आज मांगता हूँ,उससे सन्मार्ग,
आशीर्वाद, उन्नति और उत्कर्ष.
आज फिर उसकी पुण्य तिथि है,
उसके चित्र को झाड - पोंछकर,
फूलमाला से सजाकर रखा है उसी
परंपरागत केक वाली चौकी पर.
समर्पित किया है - पुष्पं , पत्रं
और मधुरं उसे, श्रद्धा भाव से.
जलाया है दीप, चढ़ाया है चन्दन,
दिखाया है - अगरबत्ती औए धूप.
देखता हूँ आज - धूप के सुगन्धित धूम्र में,
माँ, आ खडी हुई है, लिपटी श्वेतवस्त्रों में.
अब दीख रही है माँ.., मेरी प्यारी माँ...
..अब साडी, उड़ रही है, हवा में धीरे ..धीरे...
माँ, हिला रही है ....हाथ; ...हौले....हौले.....
और अब विलीन हो गयी, हवा में...व्योम में....
हवा अब बदल गयी है, ..... मेघ....में,
मेघ संगठित होकर नभ में छा गया है,
हल्की, रिमझिम बूंदें बरसा गया है.
मेघ से तो बरसा था ......पानी;
पानी तरल था, .....बूंद रूप था,
पानी ठोस था, ...ओला स्वरुप था,
ध्यान आया सघन - संगठित
ओला ही तो है, हिमवान - हिमालय.
लगा सोचने, ..माँ तो ....गंधरूपी थी,
धूम्र बनी.., वायुरुपी थी.., जलरूप बनी .
तो क्या हिमनद रूप माँ का ही है ?
क्या ये नदियाँ..., दरिया.., ये झरने,
सब .....माँ का ही प्रवाह हैं.?
हां, तभी तो करते हैं,
पालन पोषण, माँ के समान.
और ये फलदार वृक्ष ?
ये ठूंठ ...सूखे ..से पेड़ ?
क्या इसने नहीं पाला है,
हमे माँ के समान ?
क्या इससे बने पलंग, कुर्सियां, सोफे ..
अनुभूति नहीं कराते, माँ की गोद का ?
दरवाज़े बनकर क्या नहीं करते सुरक्षा ?
छत बनकर क्या नहीं करते, हमारी रक्षा?
परन्तु, आश्चर्य है, यह बात पहली बार,
आज क्यों समझ में आ रही है?
क्योंकि, आज तुने सन्मार्ग पूछा है- माँ से.
प्रगति और उत्कर्ष का मार्ग पूछा है- माँ से.
पहली बार श्राद्ध किया है तूने श्रद्धा से.
माँ, अब तुझे सन्मार्ग दिखा रही है,
प्रगति का, उत्कर्ष ka मार्ग बता रही है.
सबमें अपने अस्तित्व का बोध
करा रही है, मानो कह रही हो,
बेटे! चित्र को छोड़ो, ..तस्वीर को भूलो.
सृष्टि में मेरा ही रूप देखो, वही हूँ मैं,
वही है मेरा असली रूप, मेरा स्वरुप....
सचमुच, इस दिव्य ज्ञान के आलोक में
देखता हूँ -दर्शन के 'सर्वेश्वरवाद' को ..
यह जल अब पानी नहीं, - 'माँ' है,
यह वायु अब हवा नहीं, - 'माँ' है.
यह वृक्ष अब लकड़ी नहीं, - 'माँ' है
यह अरण्य और आरण्यक,
ये सब कुछ और नहीं, - 'माँ' है.
ये प्रस्थर...ये शैल..माँ है, माँ है.
अरे हाँ, तभी तो कहा गया है माँ को
"शैलपुत्री", 'शैलजा' और 'गिरिजा' ,
धर्म ग्रंथों में. यह हिमनद "ब्रह्मचारिणी" के
तप से है द्रवित, स्नेह से है गतिमान,
माँ है - 'हिमाचल पुत्री', गिरिराज किशोरी.
अज्ञानता की जब तक है,
घनी धुँध छायी; वह 'क़ाली' है.
भद्रक़ाली - कपालिनी - डरावनी है.
ज्ञानरूप जब चक्षु खुला,
देखा, अरे! वह 'गोरी' है, 'गौरी' है.
वह अब अम्बा है, जगदम्बा है
ब्रह्मानी रूद्राणी कमला कल्याणी है
चेतना हुई है अब जागृत,
माँ ने इसे कर दिया है- झंकृत.
सचमुच आज सन्मार्ग दिखाया है,
मुझे सत्य का बोध कराया है.
लेते हैं संकल्प अभी से, संग तुम भी ले लो मेरे भाई.
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे - "वायु प्रदूषित".
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे - "जल को दूषित".
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे - "ध्वनि प्रदूषित".
अब पेड़-पौध लगायेंगे, इसकी संख्या बहुत बढ़ाएंगे.
माँ का क़र्ज़ चुकायेंगे, अब माँ का क़र्ज़ चुकायेंगे.
हे माँ ! तुझे नमन, तुझे वंदन, बहुत बहुत अभिनन्दन.
Friday, October 8, 2010
Wednesday, October 6, 2010
इंसान: शैतान से भगवान तक
सहसा
क्यों लगने लगता है कोई
इतना अच्छा इतना महान?
जैसे बन गाया हो इंसान से
साक्षात् देवता और भगवान्.
यह क्या है ?
व्यक्तित्व का उत्थान,
अपना भ्रम - विभ्रम
या मन का माया जाल?
जीवन का उत्कर्ष है
या उसका अवसान?
क्यों दिखता है
उसमे उषा का प्रभात,
अंशुमाली का प्रकाश,
सावन की सी बरसात,
माघ की खिली धूप,
रमणी सा मृदुल रूप.
जो हर लेता है -
तन - मन का शोक,
जैसे खड़ा कोई -'अशोक'.
क्यों दिखता है?
वह अल्हड स्वतंत्र.
कोई पीरहरण मन्त्र.
तिमिर को पी जाने
वाला गायत्री सा कोई
प्यारा - न्यारा छंद.
विघ्ब विनाशक,
मृत्युंजय सा अचूक मन्त्र.
कैसे बन जाता है
कोई कृष्ण सा सारथि?
मंदिर की आरती,
मस्जिद की अजान
जैसे कई जन्मो
की पहचान.......
जानता हूँ
इस दोरंगी दुनिया में
ढेरों हैं यहाँ - शैतान.
भेड़िये के रूप में यहाँ
घूमते हैं गलियों में इंसान.
बुद्धि कहती है -
मत झांको किसी के अंतरतम
गहराइयों की अंतिम सीमा तक.
मत उड़ान भरो - बहुत ऊँचे,
अन्तरिक्ष - आसमान तक.
मत मनो किसी को भी
इंसान से भगवान तक.
पर दिल है कि मानता नहीं,
इस बुद्धि को पहचानता नहीं.
क्या सच कोई बतलायेगा?
यह पर्दा कौन उठाएगा?
मै तो ठहरा निपट अनाड़ी,
क्या मार्ग कोई दिखलाएगा?
क्यों लगने लगता है कोई
इतना अच्छा इतना महान?
जैसे बन गाया हो इंसान से
साक्षात् देवता और भगवान्.
यह क्या है ?
व्यक्तित्व का उत्थान,
अपना भ्रम - विभ्रम
या मन का माया जाल?
जीवन का उत्कर्ष है
या उसका अवसान?
क्यों दिखता है
उसमे उषा का प्रभात,
अंशुमाली का प्रकाश,
सावन की सी बरसात,
माघ की खिली धूप,
रमणी सा मृदुल रूप.
जो हर लेता है -
तन - मन का शोक,
जैसे खड़ा कोई -'अशोक'.
क्यों दिखता है?
वह अल्हड स्वतंत्र.
कोई पीरहरण मन्त्र.
तिमिर को पी जाने
वाला गायत्री सा कोई
प्यारा - न्यारा छंद.
विघ्ब विनाशक,
मृत्युंजय सा अचूक मन्त्र.
कैसे बन जाता है
कोई कृष्ण सा सारथि?
मंदिर की आरती,
मस्जिद की अजान
जैसे कई जन्मो
की पहचान.......
जानता हूँ
इस दोरंगी दुनिया में
ढेरों हैं यहाँ - शैतान.
भेड़िये के रूप में यहाँ
घूमते हैं गलियों में इंसान.
बुद्धि कहती है -
मत झांको किसी के अंतरतम
गहराइयों की अंतिम सीमा तक.
मत उड़ान भरो - बहुत ऊँचे,
अन्तरिक्ष - आसमान तक.
मत मनो किसी को भी
इंसान से भगवान तक.
पर दिल है कि मानता नहीं,
इस बुद्धि को पहचानता नहीं.
क्या सच कोई बतलायेगा?
यह पर्दा कौन उठाएगा?
मै तो ठहरा निपट अनाड़ी,
क्या मार्ग कोई दिखलाएगा?
Tuesday, October 5, 2010
योग्यता व्योम में उड़ने की
आसमान में
उड़ने की ललक
परिंदों सा व्योम में
छा जाने की अन्यतम
जिजीविषा उत्साह
और उन्मुक्त साहस
दिखाया तो बहुतों ने.
परन्तु
कौन उड़ सका है
खुले आसमान में,
बिना पंख के?
और आज का पंख
आपकी अपनी
असीम अर्जित
पवित्र योग्यता
और कौशल नहीं,
इन भू-सुरों का
कृपा पात्र होना है.
बिना इस कृपा
के उड़ना तो दूर.
धरती पर भी नहीं
दौड़ सकते आप?
नहीं लगा सकते
इच्छित कल्पित
उन्मुक्त कुलांच.
बिछा दी जाएँगी
राहों में दाने
क़ाली- पीली सरसों के,
और कहा जाएगा -
गर्व मिश्रित स्नेह से.
हम तो उतार रहें हैं
नज़र, अपने प्यारे
सलोने लाडले का.
देश के होनहार सपूत,
राष्ट्र के उज्ज्वल और
स्वर्णिम भविष्य का.
उड़ने की ललक
परिंदों सा व्योम में
छा जाने की अन्यतम
जिजीविषा उत्साह
और उन्मुक्त साहस
दिखाया तो बहुतों ने.
परन्तु
कौन उड़ सका है
खुले आसमान में,
बिना पंख के?
और आज का पंख
आपकी अपनी
असीम अर्जित
पवित्र योग्यता
और कौशल नहीं,
इन भू-सुरों का
कृपा पात्र होना है.
बिना इस कृपा
के उड़ना तो दूर.
धरती पर भी नहीं
दौड़ सकते आप?
नहीं लगा सकते
इच्छित कल्पित
उन्मुक्त कुलांच.
बिछा दी जाएँगी
राहों में दाने
क़ाली- पीली सरसों के,
और कहा जाएगा -
गर्व मिश्रित स्नेह से.
हम तो उतार रहें हैं
नज़र, अपने प्यारे
सलोने लाडले का.
देश के होनहार सपूत,
राष्ट्र के उज्ज्वल और
स्वर्णिम भविष्य का.
Monday, October 4, 2010
बड़ा कौन बूँद या समुद्र?
आखिर
बड़ा है कौन?
जल की एक बूँद
या गहरा समुद्र?
यह प्रश्न
मथ रहा है
सदियों से,
संवेदनशील
मनीषा को.
उसकी संवेदना
उसकी प्रज्ञा को.
चिन्तक वैज्ञानिक
और फ़रिश्ता को.
यह प्रश्न
जितना छोटा
जितना सरल
दीख रहा है,
है उतना ही
जटिल और गूढ़.
बड़े-बड़े विद्वान्
और ऋषि मनीषी भी
बन गए हैं यहाँ मूढ़.
जिसने भी
इस ज्ञान गंगा में
गोटा लगाया;
उनके हाथ लगा
कुछ सीपी - शंख
कुछ मोती भी.
परन्तु बहुतो ने
अपनी मुट्ठी बंद
और रीता ही पाया.
आखिर
क्यों होता है ऐसा?
यह प्रश्न क्यों नहीं है
और प्रश्नों जैसा?
क्योकि प्यारे!
यहाँ गंगा उलटी
भी बहती है.
वह बूँद
जिससे अनवरत
भरा- भरा रहता
है यह - समुद्र.
ऊपर आसमान
और अन्तरिक्ष
तक जाती है.
समुद्र की ही नहीं
आकाश की भी
तृषा मिटती है.
उसकी प्यास
बुझाती है.
यहाँ
उलझन और
भी बढ़ जाता है
जब यह अथाह
सागर एक
दिन उसी
एक बूँद में
पूरा का पूरा
समां जाता है.
बड़ा है कौन?
जल की एक बूँद
या गहरा समुद्र?
यह प्रश्न
मथ रहा है
सदियों से,
संवेदनशील
मनीषा को.
उसकी संवेदना
उसकी प्रज्ञा को.
चिन्तक वैज्ञानिक
और फ़रिश्ता को.
यह प्रश्न
जितना छोटा
जितना सरल
दीख रहा है,
है उतना ही
जटिल और गूढ़.
बड़े-बड़े विद्वान्
और ऋषि मनीषी भी
बन गए हैं यहाँ मूढ़.
जिसने भी
इस ज्ञान गंगा में
गोटा लगाया;
उनके हाथ लगा
कुछ सीपी - शंख
कुछ मोती भी.
परन्तु बहुतो ने
अपनी मुट्ठी बंद
और रीता ही पाया.
आखिर
क्यों होता है ऐसा?
यह प्रश्न क्यों नहीं है
और प्रश्नों जैसा?
क्योकि प्यारे!
यहाँ गंगा उलटी
भी बहती है.
वह बूँद
जिससे अनवरत
भरा- भरा रहता
है यह - समुद्र.
ऊपर आसमान
और अन्तरिक्ष
तक जाती है.
समुद्र की ही नहीं
आकाश की भी
तृषा मिटती है.
उसकी प्यास
बुझाती है.
यहाँ
उलझन और
भी बढ़ जाता है
जब यह अथाह
सागर एक
दिन उसी
एक बूँद में
पूरा का पूरा
समां जाता है.
Sunday, October 3, 2010
परिभाषा न्यायाधीश की.
आज फिर याद आयी
कहानी मुंशी प्रेमचंद की.
एक बार फिर प्रमाणित हुयी
परिभाषा - 'न्यायाधीश'की.
पंच होता है - 'परमेश्वर'
उसकी जाति उसकी आस्था,
उसका मजहब उसका धर्म,
है मात्र और मात्र - 'न्याय'.
नहीं कर कर सकता वह
किसी के भी साथ - 'अन्याय',
क्योकि न्याय है- 'समग्रप्रेम',
न्याय है एक - 'आराधना'
न्याय है - 'एक साधना'
न्याय है एक - 'उपासना',
न्याय है इन के मूल में 'सना',
चाहे जैसी भी हो - 'संवेदना'.
न्याय कुर्सी पर बैठा इंसान
नहीं होता हिन्दू या मुस्लमान,
वह होता केवल - 'न्यायी इंसान,
'पंच परमेश्वर' और 'न्याय भगवान्'.
कहानी मुंशी प्रेमचंद की.
एक बार फिर प्रमाणित हुयी
परिभाषा - 'न्यायाधीश'की.
पंच होता है - 'परमेश्वर'
उसकी जाति उसकी आस्था,
उसका मजहब उसका धर्म,
है मात्र और मात्र - 'न्याय'.
नहीं कर कर सकता वह
किसी के भी साथ - 'अन्याय',
क्योकि न्याय है- 'समग्रप्रेम',
न्याय है एक - 'आराधना'
न्याय है - 'एक साधना'
न्याय है एक - 'उपासना',
न्याय है इन के मूल में 'सना',
चाहे जैसी भी हो - 'संवेदना'.
न्याय कुर्सी पर बैठा इंसान
नहीं होता हिन्दू या मुस्लमान,
वह होता केवल - 'न्यायी इंसान,
'पंच परमेश्वर' और 'न्याय भगवान्'.
Saturday, October 2, 2010
बापू के नाम खुला पत्र
बापू! मै भारत का वासी, तेरी निशानी ढूंढ रहा हूँ.
बापू! मै तेरे सिद्धान्त, दर्शन,सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.
कहने को तुम कार्यालय में हो, न्यायालय में हो,
जेब में हो, तुम वस्तु में हो, सभा में मंचस्थ भी हो,
कंठस्थ भी हो, हो तुम इतने ..निकट - सन्निकट...,
परन्तु बापू! सच बताना आचरण में तुम क्यों नहीं हो?
उचट गया मन इस समाज से, देखो कितनी दूषित है.
रीति-नीति सब कुचल गयी, नभ-जल-थल सभी प्रदूषित है.
घूमा बहुत इधर उधर, मन बार - बार तुमपर टिकता है.
अब फिर आ जाओ गांधी बाबा, मुझे तेरी बहुत जरुरत है.
संत भगीरथ ने अपने पुरखों को, गंगाजल से तारा है.
तुम भी तो एक 'राजसंत' थे, हमने बहुत विचारा है.
तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
नई पौध को सिंचित करके, एक भारत नया बनाना है.
अपनी गंगा तो सूख सी गयी, पर नहीं मानव की भूख गयी है.
सूख गयी थी पहले ही सरस्वती, अब गंगा - यमुना की बारी है.
देखो गंगोत्री- जमुनोत्री-गंगासागर को, वहां लगा ग्रहण कुछ भारी है.
दशा सुधरने में हम अक्षम, कुछ कर न सके, अफ़सोस यही लाचारी है.
एक आस विश्वास तुम्ही पर, कुछ हक़ है, तभी पुकारी है.
थोडा सा हूँ जिद्दी मै भी, अभियान प्रदूषण मुक्ति की ठानी है.
अस्त्र- शस्त्र है मात्र लेखनी, उसी के बल जंग ये जीती जानी है.
बिना शस्त्र तो तुम भी लड़े थे, बड़ों - बड़ो को चित किये थे .
देखो! मै भी शस्त्र हीन हूँ, तुम्हे मेरा साथ निभाना है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
गंगाजल जो तुम लाओगे उस धारा को गोमुख से हम जोड़ेंगे.
गंगा-यमुना नहीं सूखने देंगे, जलधारा अजस्र स्रोत से जोड़ेंगे.
दूषित नीति मिटायेंगे, सब कलुष - कलेश भगायेंगे.
नयी उमंगें, नई तरंगे लायेंगे ; अब नया सवेरा लायेंगे.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
जल्दी गंगाजल लेकर आओ, यह अनुरोध हमारा है.
यह अनुरोध हमारा है. ....हाँ ... यह अनुरोध हमारा है.
बापू! मै तेरे सिद्धान्त, दर्शन,सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.
कहने को तुम कार्यालय में हो, न्यायालय में हो,
जेब में हो, तुम वस्तु में हो, सभा में मंचस्थ भी हो,
कंठस्थ भी हो, हो तुम इतने ..निकट - सन्निकट...,
परन्तु बापू! सच बताना आचरण में तुम क्यों नहीं हो?
उचट गया मन इस समाज से, देखो कितनी दूषित है.
रीति-नीति सब कुचल गयी, नभ-जल-थल सभी प्रदूषित है.
घूमा बहुत इधर उधर, मन बार - बार तुमपर टिकता है.
अब फिर आ जाओ गांधी बाबा, मुझे तेरी बहुत जरुरत है.
संत भगीरथ ने अपने पुरखों को, गंगाजल से तारा है.
तुम भी तो एक 'राजसंत' थे, हमने बहुत विचारा है.
तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
नई पौध को सिंचित करके, एक भारत नया बनाना है.
अपनी गंगा तो सूख सी गयी, पर नहीं मानव की भूख गयी है.
सूख गयी थी पहले ही सरस्वती, अब गंगा - यमुना की बारी है.
देखो गंगोत्री- जमुनोत्री-गंगासागर को, वहां लगा ग्रहण कुछ भारी है.
दशा सुधरने में हम अक्षम, कुछ कर न सके, अफ़सोस यही लाचारी है.
एक आस विश्वास तुम्ही पर, कुछ हक़ है, तभी पुकारी है.
थोडा सा हूँ जिद्दी मै भी, अभियान प्रदूषण मुक्ति की ठानी है.
अस्त्र- शस्त्र है मात्र लेखनी, उसी के बल जंग ये जीती जानी है.
बिना शस्त्र तो तुम भी लड़े थे, बड़ों - बड़ो को चित किये थे .
देखो! मै भी शस्त्र हीन हूँ, तुम्हे मेरा साथ निभाना है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
गंगाजल जो तुम लाओगे उस धारा को गोमुख से हम जोड़ेंगे.
गंगा-यमुना नहीं सूखने देंगे, जलधारा अजस्र स्रोत से जोड़ेंगे.
दूषित नीति मिटायेंगे, सब कलुष - कलेश भगायेंगे.
नयी उमंगें, नई तरंगे लायेंगे ; अब नया सवेरा लायेंगे.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
जल्दी गंगाजल लेकर आओ, यह अनुरोध हमारा है.
यह अनुरोध हमारा है. ....हाँ ... यह अनुरोध हमारा है.
Wednesday, September 29, 2010
न्याय है - प्रेम का ढाई अक्षर
प्रेम का पवित्र ढाई आखर
न सीख पाने वाले भद्रजन,
जाने कैसे इतनी जल्दी
सीख लेते हैं - चार अक्षरों
वाला यह शब्द - "नफरत".
सत्य का अनुपम सौन्दर्य
देख नहीं पाने वाले उन
नेत्रयुक्त अंधों को यह दुनिया
कैसे दिखती है इतनी हसीन?
सत्य में, प्रेम में, शिव में, राम में
ढाई अक्षर को नहीं ढ़ो पाने वाले :
असत्य की, नफरत की, हिंसा की
भारी - बोझिल गठरी कैसे ढ़ो लेते हैं?
शिवम के सत्य को नकारने वाले
किस सौन्दर्य की तलाश करते हैं?
क्या उन्हें पता नहीं क़ि जो सत्य है
वही शिव है, शिव स्वरुप ही प्रेम है.
प्रेम ही शिवम है, सत्य है और
प्रेम का प्रसार ही सुन्दरम है.
सत्य से निःसृत प्रेम ही न्याय है -
न्याय श्रेष्ठ ही नहीं, श्रेष्ठतर भी है.
इसलिए हमें स्वीकारना चाहिए
अपनाना चाहिए इस न्याय को,
सत्कर्म को, सत्य के इस मर्म को.
मानवता और मानवीय धर्म को.
न सीख पाने वाले भद्रजन,
जाने कैसे इतनी जल्दी
सीख लेते हैं - चार अक्षरों
वाला यह शब्द - "नफरत".
सत्य का अनुपम सौन्दर्य
देख नहीं पाने वाले उन
नेत्रयुक्त अंधों को यह दुनिया
कैसे दिखती है इतनी हसीन?
सत्य में, प्रेम में, शिव में, राम में
ढाई अक्षर को नहीं ढ़ो पाने वाले :
असत्य की, नफरत की, हिंसा की
भारी - बोझिल गठरी कैसे ढ़ो लेते हैं?
शिवम के सत्य को नकारने वाले
किस सौन्दर्य की तलाश करते हैं?
क्या उन्हें पता नहीं क़ि जो सत्य है
वही शिव है, शिव स्वरुप ही प्रेम है.
प्रेम ही शिवम है, सत्य है और
प्रेम का प्रसार ही सुन्दरम है.
सत्य से निःसृत प्रेम ही न्याय है -
न्याय श्रेष्ठ ही नहीं, श्रेष्ठतर भी है.
इसलिए हमें स्वीकारना चाहिए
अपनाना चाहिए इस न्याय को,
सत्कर्म को, सत्य के इस मर्म को.
मानवता और मानवीय धर्म को.
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