जीवन क्या है ?
जन्म से मृत्यु तक की
यात्रा या और भी कुछ ?
संस्कृति का वरदान,
या प्रकृति की नियति ?
यदि संस्कृति का वरदान है
तो ढेर सारे प्रश्न है -
समाधान हेतु; और
यदि प्रकृति की नियति है
तो, वहां प्रश्न कहाँ ?
और जहाँ प्रश्न नहीं,
वहां विचार कहाँ ? और
जहाँ विवेक - विचार नहीं,
तर्क - वितर्क नहीं;
वहां मानवता कहाँ ?
इंसानियत कहाँ ..?
सभ्यता कहाँ ....?
और मानवता विहीन,
नैतिकता से हीन
हम क्या हैं?
कहीं वही तो नहीं,
जिसे परिभाषित किया गया है -
"मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति" में.
क्या जीवन का प्रथम प्रश्न
औचित्य का प्रश्न नहीं है?
हाँ यही प्रथम प्रश्न है
और महत्वपूर्ण प्रश्न है,
जिसके समाधान हेतु
मानव का सम्पूर्ण जीवन;
अनवरत लगा हुआ है -
भूत से वर्तमान और
वर्तमान से भविष्यत तक.
समय विहंस रहा है;
दोनों को परख रहा है,
प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ कृति पर,
जिसे अपने बुद्धि - विवेक,
ज्ञान -विज्ञान पर दंभ तो है,
परन्तु औचित्य के प्रश्न पर
चिन्तन - मंथन
अनवरत जारी है..........
यह भूत का प्रश्न था,
वर्तमान का प्रश्न है और,
भविष्यत का भी प्रश्न रहेगा.
समय सब कुछ निरख रहा है,
सूक्ष्म दृष्टि से परख रहा है;
दोनों में कितना है अंतर?
भली भांति यह समझ रहा है.
संस्कृति का वरदान -
औचित्य का परिणाम है,
यह मृत्यु को नकार,
मृत्युंजय बनने की प्रक्रिया है.
और प्रकृति की नियति -
उन्मुक्त काम - वासना ,
यौनपिपासा की कुत्सित विकृति है.
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, पुनः
आ डटे हैं - कौरव और पांडव,
परन्तु गीतामृत पान करानेवाला
वह दिव्य सारथि कहाँ है?
आज का अर्जुन तो व्यामोह में
खडा है, दायित्व और कर्त्तव्य के
द्वंद्व में आज भी फंसा है.
कालचक्र फिर घूमा है;
निर्णय अर्जुन को लेना है,
और आज,यदि द्वंद से
निकल नहीं पाया तो
इस वर्तमान का क्या अर्थ है?
फिर तो औचित्य का प्रश्न भी व्यर्थ है.
Thursday, June 3, 2010
Tuesday, June 1, 2010
चिन्तक, चेतना और मूल्य
पूछते हो -
चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या ?
परन्तु,
चिन्तक को कभी
मान - सम्मान,
मकान - दुकान की
लिप्सा रही है क्या ?
पूछते हो -
चिन्तक समाज को
देता है क्या ?
अरे! चिन्तक
समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?
उसकी पूँजी तो हैं -
उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द,
प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न.
जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से,
परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए,
जन कल्याण के लिए.
वह ऋणी है -
समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का,
प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है -
संवेदनाओं को पाकर,
आहात होकर.
वह आह्लादित है -
नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है -
औचित्य के प्रश्न का
समाधान ढूंढकर.
कर्मयोगी है वह,
निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला
.....कोई पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी...
उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास
कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों
तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय,
अलग बात है.
सुनकर सभ्यता - संस्कृति के
.......... क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण
चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी
रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा,
नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार,
गर्जन करेंगे उद्घोष -
सुनो! सुनो!! और सुनो!!!
अरे ओ सभ्य मानव!
प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर
मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में
अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर
क्यों हटा रहा?
प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को,
जहरीली क्यों बना रहा?
विज्ञान को वरदान ही
रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए
अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया
कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है,
तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत
और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का
कालिदास और आइन्स्टीन बना.
अरे भाई!
चिन्तक के इन तीरों को
समाज सह लेता है,
पूरा ना सही,
कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए,
यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली
मान-सम्मान और प्रतिदान है.
चिन्तक न सुविधाभोगी है,
न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है,
जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात
तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को
व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और
कर्त्तव्य से प्यार है. और
एक चिन्तक के जीवन
और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.
चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या ?
परन्तु,
चिन्तक को कभी
मान - सम्मान,
मकान - दुकान की
लिप्सा रही है क्या ?
पूछते हो -
चिन्तक समाज को
देता है क्या ?
अरे! चिन्तक
समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?
उसकी पूँजी तो हैं -
उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द,
प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न.
जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से,
परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए,
जन कल्याण के लिए.
वह ऋणी है -
समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का,
प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है -
संवेदनाओं को पाकर,
आहात होकर.
वह आह्लादित है -
नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है -
औचित्य के प्रश्न का
समाधान ढूंढकर.
कर्मयोगी है वह,
निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला
.....कोई पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी...
उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास
कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों
तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय,
अलग बात है.
सुनकर सभ्यता - संस्कृति के
.......... क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण
चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी
रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा,
नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार,
गर्जन करेंगे उद्घोष -
सुनो! सुनो!! और सुनो!!!
अरे ओ सभ्य मानव!
प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर
मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में
अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर
क्यों हटा रहा?
प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को,
जहरीली क्यों बना रहा?
विज्ञान को वरदान ही
रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए
अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया
कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है,
तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत
और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का
कालिदास और आइन्स्टीन बना.
अरे भाई!
चिन्तक के इन तीरों को
समाज सह लेता है,
पूरा ना सही,
कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए,
यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली
मान-सम्मान और प्रतिदान है.
चिन्तक न सुविधाभोगी है,
न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है,
जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात
तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को
व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और
कर्त्तव्य से प्यार है. और
एक चिन्तक के जीवन
और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.
Saturday, May 29, 2010
स्वाभिमान की कीमत क्या होती है?
स्वाभिमान की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी जवानी से.
और जान की कीमत क्या होती है?
पूछो - उस बलिदानी से.
अपमान की कीमत क्या होती है?
पूछो -किसी कहानी से.
अरे! आन की कीमत क्या होती है?
पूछो - झाँसी की रानी से.
त्याग की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'दधीचि' से.
छल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'मारीच' से.
नारीत्व की कीमत होती क्या?
कुछ जानते मेरे भैया?
त्रिदेवों को शिशु बना दिया,
था नाम उसका,-'अनुसुइया'.
सत्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा हरिश्चंद्र' से.
कर्तव्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा रामचंद्र' से.
भोग की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा नहुष' से.
डोरी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी धनुष से.
अनुराग की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम मीरा से.
ताज की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम हीरा से.
राज्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - भरत सम ज्ञानी से.
युद्ध की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - दशानन अभिमानी से.
बम की विभीषिका क्या होती है?
तू पूछ - किसी जापानी से.
वात्सल्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - किसी भी नानी से.
अविवेक की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'ध्रितराष्ट्र' से.
आतंक की मार है होती क्या?
तू पूछ - इसे - महाराष्ट्र से.
मन्त्र की शक्ति क्या होती है?
पूछो - तुम 'गायत्री' से.
विवेक की शक्ति क्या होती है?
इसे पूछो - तुम 'सावित्री' से.
ज्ञान की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'नचिकेता' से.
शिशु की कीमत क्या होती है?
पूछो - तुम नई प्रसूता से.
बेटे की कीमत क्या होती है?
पूछो - तू अपनी माता से.
बेटी की कीमत क्या होती है?
पूछो - अपनी अभिलाषा से.
पश्चाताप की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'सुकन्या' से.
वर की कीमत क्या होती है?
पूछो - दुल्हन बनी किसी कन्या से.
तेल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी चिराग से.
टिप्पणी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'ब्लॉग' से.
पूछो - किसी जवानी से.
और जान की कीमत क्या होती है?
पूछो - उस बलिदानी से.
अपमान की कीमत क्या होती है?
पूछो -किसी कहानी से.
अरे! आन की कीमत क्या होती है?
पूछो - झाँसी की रानी से.
त्याग की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'दधीचि' से.
छल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'मारीच' से.
नारीत्व की कीमत होती क्या?
कुछ जानते मेरे भैया?
त्रिदेवों को शिशु बना दिया,
था नाम उसका,-'अनुसुइया'.
सत्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा हरिश्चंद्र' से.
कर्तव्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा रामचंद्र' से.
भोग की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा नहुष' से.
डोरी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी धनुष से.
अनुराग की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम मीरा से.
ताज की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम हीरा से.
राज्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - भरत सम ज्ञानी से.
युद्ध की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - दशानन अभिमानी से.
बम की विभीषिका क्या होती है?
तू पूछ - किसी जापानी से.
वात्सल्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - किसी भी नानी से.
अविवेक की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'ध्रितराष्ट्र' से.
आतंक की मार है होती क्या?
तू पूछ - इसे - महाराष्ट्र से.
मन्त्र की शक्ति क्या होती है?
पूछो - तुम 'गायत्री' से.
विवेक की शक्ति क्या होती है?
इसे पूछो - तुम 'सावित्री' से.
ज्ञान की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'नचिकेता' से.
शिशु की कीमत क्या होती है?
पूछो - तुम नई प्रसूता से.
बेटे की कीमत क्या होती है?
पूछो - तू अपनी माता से.
बेटी की कीमत क्या होती है?
पूछो - अपनी अभिलाषा से.
पश्चाताप की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'सुकन्या' से.
वर की कीमत क्या होती है?
पूछो - दुल्हन बनी किसी कन्या से.
तेल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी चिराग से.
टिप्पणी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'ब्लॉग' से.
Friday, May 28, 2010
क्या मानव होना इतना कठिन है?
संस्कृति के उत्थान और
पतन के साथ ही साथ,
मानवसमाज के उत्थान
और पतन की कहानी सुनी है,
उसे इतिहास - भूगोल के आईने,
तथा युगीन सभ्यता के झरोखों से
देखा परखा भी है,
विभिन्न गोष्ठियों, - सेमिनारों में
इस पर गहन विमर्श किया है,
परन्तु धर्म के नाम पर जैसा
अधर्म, जैसी क्रूरता...., विभत्सता....,
आज दृष्टिगत हो रही है....,
क्या उसे हम धर्म कहेंगे?
क्या इस पर पुनर्विचार करेंगे?
देव मंदिर, लोकतंत्र का मंदिर,
न्याय मंदिर भी नहीं है सुरक्षित.
आदिम मनुष्य तो अशिक्षित था,
अनपढ़, गवार, निरा भावुक था..,
उसका कृत्य तो फिर भी
कुछ समझ में आता है.
परन्तु आज ....२१वी सदी में
यह कलह - कोलाहल... क्यों है?
मजे की बात यह कि धर्म के
ये सभी ठेकेदार डिग्री धारक हैं.
क्या मनुष्य आज अपने धर्म को
पहचान पाया है?
धर्म की बात छोडिये, जाने दीजिये,
क्या स्वयं को पहचान पाया पाया है?
आज का मानव न दाढ़ीवाला रहा,
न चोटीवाला, और न टाई वाला,
अंतर्जातीय वैवाहिक संबंधों के कारण,
आज वह न किसी कुल का रहा,
न किसी परिवार का और
न ही किसी परंपरा विशेष का .
आज मानव की पहचान
मात्र नंबर है, केवल नंबर...,
वह या तो मकान नंबर है,
या राशन कार्ड नंबर.
वह इस नंबर में ही हैरान है,
और निन्यानबे के चक्कर में
परेशान है...........
अंततः वही प्रश्न, आखिर वह है कौन?
क्या वह मोबाइल नंबर और फोन नंबर है?
अथवा पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आई कार्ड है?
वह दो पहिया वाहन का नंबर है, या
तीन पहिया और चार पहिया का? ,
वह बैंक नंबर है या टिकेट नंबर है हवाई?
वह हिन्दू है, मुस्लिम है, सिख है या ईसाई?
आखिर इस सभी मान्यताओं
और व्यवस्थाओं के बीच
मात्र मानव क्यों नहीं है?
क्या मानव होना इतना कठिन है?
क्या इतना दुरूह और दुष्कर है?
परन्तु मानवता से बढकर,
क्या कुछ भी श्रेष्ठतर है?
अब दुराग्रह छोडो!,
निद्रा तोड़ो!!, तन्द्रा तोड़ो!!!
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
काट सभी बंधन को हमें,
मानवता को अपनाना होगा.
हां, मानवता को अपनाना होगा.
पतन के साथ ही साथ,
मानवसमाज के उत्थान
और पतन की कहानी सुनी है,
उसे इतिहास - भूगोल के आईने,
तथा युगीन सभ्यता के झरोखों से
देखा परखा भी है,
विभिन्न गोष्ठियों, - सेमिनारों में
इस पर गहन विमर्श किया है,
परन्तु धर्म के नाम पर जैसा
अधर्म, जैसी क्रूरता...., विभत्सता....,
आज दृष्टिगत हो रही है....,
क्या उसे हम धर्म कहेंगे?
क्या इस पर पुनर्विचार करेंगे?
देव मंदिर, लोकतंत्र का मंदिर,
न्याय मंदिर भी नहीं है सुरक्षित.
आदिम मनुष्य तो अशिक्षित था,
अनपढ़, गवार, निरा भावुक था..,
उसका कृत्य तो फिर भी
कुछ समझ में आता है.
परन्तु आज ....२१वी सदी में
यह कलह - कोलाहल... क्यों है?
मजे की बात यह कि धर्म के
ये सभी ठेकेदार डिग्री धारक हैं.
क्या मनुष्य आज अपने धर्म को
पहचान पाया है?
धर्म की बात छोडिये, जाने दीजिये,
क्या स्वयं को पहचान पाया पाया है?
आज का मानव न दाढ़ीवाला रहा,
न चोटीवाला, और न टाई वाला,
अंतर्जातीय वैवाहिक संबंधों के कारण,
आज वह न किसी कुल का रहा,
न किसी परिवार का और
न ही किसी परंपरा विशेष का .
आज मानव की पहचान
मात्र नंबर है, केवल नंबर...,
वह या तो मकान नंबर है,
या राशन कार्ड नंबर.
वह इस नंबर में ही हैरान है,
और निन्यानबे के चक्कर में
परेशान है...........
अंततः वही प्रश्न, आखिर वह है कौन?
क्या वह मोबाइल नंबर और फोन नंबर है?
अथवा पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आई कार्ड है?
वह दो पहिया वाहन का नंबर है, या
तीन पहिया और चार पहिया का? ,
वह बैंक नंबर है या टिकेट नंबर है हवाई?
वह हिन्दू है, मुस्लिम है, सिख है या ईसाई?
आखिर इस सभी मान्यताओं
और व्यवस्थाओं के बीच
मात्र मानव क्यों नहीं है?
क्या मानव होना इतना कठिन है?
क्या इतना दुरूह और दुष्कर है?
परन्तु मानवता से बढकर,
क्या कुछ भी श्रेष्ठतर है?
अब दुराग्रह छोडो!,
निद्रा तोड़ो!!, तन्द्रा तोड़ो!!!
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
काट सभी बंधन को हमें,
मानवता को अपनाना होगा.
हां, मानवता को अपनाना होगा.
Thursday, May 27, 2010
समय क्या है?
समय क्या है?
काल का प्रवाह या
जिन्दगी का प्रश्नपत्र?
जिसमे करना पड़ता है
समाधान द्वंद्वों का.
जहाँ होता है: मंथन,
अनेकशः किन्तु - परन्तु,
तर्कों - कुतर्कों पर.
यहाँ परीक्षक और पर्क्षार्थी तो
व्यक्ति स्वयं है, परन्तु,
प्रश्नपत्र?
क्या वह भी उसी की
गतिविधियों का प्रतिफल नहीं है?
समय तो
काल खण्ड के रूप में
प्रदान करता है,
मात्र एक अवसर.
मंथन एवं समाधान का.
सुविधा के लिए
जिसे हमने बाँट दिया है
टुकड़ों में.
भूत की पश्चाताप,
वर्तमान की निराशा और
भविष्यत की परिकल्पना,
निरा स्वप्न, एक आशा में.
जिसे हम भूत कहते है,
वह क्या है?
एक दर्पण - जिसमे,
भोगे गए क्षणों को,
अपने ही धब्बों को,
देखा जा सकता है.
और वर्तमान?
उन धब्बों को मिटाने का,
एक अवसर.
क्रियान्वयन की योजना,
शान्ति की आशा.
भूत की सीढ़ी दोना
शायद उचित नहीं,
परन्तु भूत का तिरस्कार,
क्या उचित होगा?
भूत के अवसाद - विषद में ही,
क्या गुम्फित नहीं है,
भविष्य का सुखद परिष्कार?
भविष्यत क्या है?
औचित्य के प्रश्न का
सम्यक समाधान.
एक स्वप्न, एक आशा,
एक संबल, एक प्रत्याशा.
काल का प्रवाह या
जिन्दगी का प्रश्नपत्र?
जिसमे करना पड़ता है
समाधान द्वंद्वों का.
जहाँ होता है: मंथन,
अनेकशः किन्तु - परन्तु,
तर्कों - कुतर्कों पर.
यहाँ परीक्षक और पर्क्षार्थी तो
व्यक्ति स्वयं है, परन्तु,
प्रश्नपत्र?
क्या वह भी उसी की
गतिविधियों का प्रतिफल नहीं है?
समय तो
काल खण्ड के रूप में
प्रदान करता है,
मात्र एक अवसर.
मंथन एवं समाधान का.
सुविधा के लिए
जिसे हमने बाँट दिया है
टुकड़ों में.
भूत की पश्चाताप,
वर्तमान की निराशा और
भविष्यत की परिकल्पना,
निरा स्वप्न, एक आशा में.
जिसे हम भूत कहते है,
वह क्या है?
एक दर्पण - जिसमे,
भोगे गए क्षणों को,
अपने ही धब्बों को,
देखा जा सकता है.
और वर्तमान?
उन धब्बों को मिटाने का,
एक अवसर.
क्रियान्वयन की योजना,
शान्ति की आशा.
भूत की सीढ़ी दोना
शायद उचित नहीं,
परन्तु भूत का तिरस्कार,
क्या उचित होगा?
भूत के अवसाद - विषद में ही,
क्या गुम्फित नहीं है,
भविष्य का सुखद परिष्कार?
भविष्यत क्या है?
औचित्य के प्रश्न का
सम्यक समाधान.
एक स्वप्न, एक आशा,
एक संबल, एक प्रत्याशा.
Wednesday, May 26, 2010
यह मात्र कोरी परिकल्पना नहीं है..
निराश नहीं हूँ मै, तलाश रहा हूँ
अब भी...आज भी..., लगातार.....
ऐसे इंसानों को, ....
इस 'ब्लोग्स' के माध्यम से
जो ...मानवता की, आवाज बन जाय,
इंसानियत की पहचान बन जाय.
संविधान की तेजस्विता,... ,
उसके सुप्त पौरुष को जगा जाय.
अन्यथा यह स्वतंत्रता.....,
'स्व' का 'तंतु' बन जायेगा.
हम नहीं कह सकते,कि जंगल तो रहे नहीं,
इसलिए जंगलराज का खतरा नहीं?
'तत्र' भी भले तंतु बनने से बच जाय,
परन्तु सोचिये !..फिर सोचिये !.!
लोक का क्या होगा?
लोक मंगल का क्या होगा?
हमारी संकृति का क्या होगा?
हमारी प्रकृति का क्या होगा?
इसलिए हमें तलाश है -
कर्त्तव्यपरयनों की..
ऐसे इंसान की जिसका,
जाति, धर्म, लिंग, पहचान,चाहे जो हो, परन्तु;
अन्दर का इंसान जागृत हो.
हम ऐसे मानव को,
समग्र मानव के रूप में
विकसित करना चाहते है,
समग्र मानव वह है - जिसके मष्तिस्क में,
'ब्रह्म तेज', भुजाओं में क्षात्रत्व का बल,:
वणिक का वाक्-चातुर्य, कृषक सी उदारता,
उसकी पोषक क्षमता, और धैर्य
सब एकसाथ समन्वित रूप में विद्यमान हो.
यह सच्चा कर्म योगी होगा,
आदर्श होगा.....परन्तु ...
एक और अकेला नहीं होगा.
बहुलता में होगा,
नकारात्मकता को
मिटाया तो नहीं जा सकता,
यह प्रकृति का अनिवार्य तत्त्व है.
उसका जन्मजात अवयव है
हाँ, इसे सीमित, बहुत ही न्यून
अवश्य किया जा सकता है.
हम होंगे ..आप होंगे,.. वे होंगे ...
तब अपना सपना साकार होगा.
अब यह आप पर निर्भर है;
कितनी गंभीरता से इसे लेते हैं.
यह मात्र कोरी परिकल्पना नहीं है.
छिपा है पीछे एक सुविचारित दर्शन.
सुखद, शांतिप्रिय समाज संरचना की,
एक उत्कट तीव्र अभिलाषा,
एक दुर्घर्ष जिजीविषा....
एक समर्पित अभीप्सा....
और .भी .बहुत कुछ...बहुत कुछ..
यह कोई उपकार नहीं,
समाज का, जन्मभूमि का
एक बड़ा ऋण है हम पर ..,
समाज के उसी कर्ज को,
फर्ज रूप में समाज को ही
लौटना चाहते है.
प्रकृति के अनुदान को कर स्वीकार,
उसके मान-सम्मान को बढ़ाना चाहते हैं.
जाने अनजाने, जंगल को बंजर भले किया हो,
अब वृक्ष- बाग़ - वन खूब लगाना, चाहते हैं.
अब भी...आज भी..., लगातार.....
ऐसे इंसानों को, ....
इस 'ब्लोग्स' के माध्यम से
जो ...मानवता की, आवाज बन जाय,
इंसानियत की पहचान बन जाय.
संविधान की तेजस्विता,... ,
उसके सुप्त पौरुष को जगा जाय.
अन्यथा यह स्वतंत्रता.....,
'स्व' का 'तंतु' बन जायेगा.
हम नहीं कह सकते,कि जंगल तो रहे नहीं,
इसलिए जंगलराज का खतरा नहीं?
'तत्र' भी भले तंतु बनने से बच जाय,
परन्तु सोचिये !..फिर सोचिये !.!
लोक का क्या होगा?
लोक मंगल का क्या होगा?
हमारी संकृति का क्या होगा?
हमारी प्रकृति का क्या होगा?
इसलिए हमें तलाश है -
कर्त्तव्यपरयनों की..
ऐसे इंसान की जिसका,
जाति, धर्म, लिंग, पहचान,चाहे जो हो, परन्तु;
अन्दर का इंसान जागृत हो.
हम ऐसे मानव को,
समग्र मानव के रूप में
विकसित करना चाहते है,
समग्र मानव वह है - जिसके मष्तिस्क में,
'ब्रह्म तेज', भुजाओं में क्षात्रत्व का बल,:
वणिक का वाक्-चातुर्य, कृषक सी उदारता,
उसकी पोषक क्षमता, और धैर्य
सब एकसाथ समन्वित रूप में विद्यमान हो.
यह सच्चा कर्म योगी होगा,
आदर्श होगा.....परन्तु ...
एक और अकेला नहीं होगा.
बहुलता में होगा,
नकारात्मकता को
मिटाया तो नहीं जा सकता,
यह प्रकृति का अनिवार्य तत्त्व है.
उसका जन्मजात अवयव है
हाँ, इसे सीमित, बहुत ही न्यून
अवश्य किया जा सकता है.
हम होंगे ..आप होंगे,.. वे होंगे ...
तब अपना सपना साकार होगा.
अब यह आप पर निर्भर है;
कितनी गंभीरता से इसे लेते हैं.
यह मात्र कोरी परिकल्पना नहीं है.
छिपा है पीछे एक सुविचारित दर्शन.
सुखद, शांतिप्रिय समाज संरचना की,
एक उत्कट तीव्र अभिलाषा,
एक दुर्घर्ष जिजीविषा....
एक समर्पित अभीप्सा....
और .भी .बहुत कुछ...बहुत कुछ..
यह कोई उपकार नहीं,
समाज का, जन्मभूमि का
एक बड़ा ऋण है हम पर ..,
समाज के उसी कर्ज को,
फर्ज रूप में समाज को ही
लौटना चाहते है.
प्रकृति के अनुदान को कर स्वीकार,
उसके मान-सम्मान को बढ़ाना चाहते हैं.
जाने अनजाने, जंगल को बंजर भले किया हो,
अब वृक्ष- बाग़ - वन खूब लगाना, चाहते हैं.
Monday, May 24, 2010
अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
भटक गए है आज लक्ष्य से, निज संस्कृति से हम दूर हो रहे.
अध्यात्म शक्ति को भूल गए, भौतिकता में ही मशगूल रहे.
पूर्वजों की उपलब्धियों में, छिद्रान्वेषण ही नित करते रहे.
परिभाषाएं स्वार्थ परक, परम्पराएँ सुविधानुकुल गढ़ते रहे
मोक्ष-मुक्ति, निर्वाण-कैवल्य, फना -बका में ही उलझे
श्रेष्ठतर की प्रत्याशा में, वर्चस्व की कोरी आशा में;
अंहकार - इर्ष्या में जलकर, अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
बनना था हमें 'दिव्य मानव', और बन गए देखो 'मानव बम'.
इससे तो फिर भी अच्छा था, हम 'वन - मानुष' ही रहते.
शीत - ताप से, भूख -प्यास से, इतना नहीं तड़पते.
अरे! भटके हुए धर्माचार्यों, हमें नहीं स्वर्ग की राह दिखाओ.
कामिनी- कंचन, सानिध्य हूर का, भ्रम जाल यहाँ मत फैलाओ.
दिव्यता की बात भी छोडो, हो सके तो; मानव को मानव से जोडो.
अब रहे न कोई 'वन मानुष', अब बने न कोई ' मानव बम'.
कुछ ऐसी अलख जगाओ, दिव्यता स्वर्ग की; यहीं जमीं पर लाओ.
अब हमको मत बहलाओ, दिव्यता स्वर्ग की; इसी जमीं पर लाओ.
अध्यात्म शक्ति को भूल गए, भौतिकता में ही मशगूल रहे.
पूर्वजों की उपलब्धियों में, छिद्रान्वेषण ही नित करते रहे.
परिभाषाएं स्वार्थ परक, परम्पराएँ सुविधानुकुल गढ़ते रहे
मोक्ष-मुक्ति, निर्वाण-कैवल्य, फना -बका में ही उलझे
श्रेष्ठतर की प्रत्याशा में, वर्चस्व की कोरी आशा में;
अंहकार - इर्ष्या में जलकर, अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
बनना था हमें 'दिव्य मानव', और बन गए देखो 'मानव बम'.
इससे तो फिर भी अच्छा था, हम 'वन - मानुष' ही रहते.
शीत - ताप से, भूख -प्यास से, इतना नहीं तड़पते.
अरे! भटके हुए धर्माचार्यों, हमें नहीं स्वर्ग की राह दिखाओ.
कामिनी- कंचन, सानिध्य हूर का, भ्रम जाल यहाँ मत फैलाओ.
दिव्यता की बात भी छोडो, हो सके तो; मानव को मानव से जोडो.
अब रहे न कोई 'वन मानुष', अब बने न कोई ' मानव बम'.
कुछ ऐसी अलख जगाओ, दिव्यता स्वर्ग की; यहीं जमीं पर लाओ.
अब हमको मत बहलाओ, दिव्यता स्वर्ग की; इसी जमीं पर लाओ.
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